देश के कारोबारी वर्ग- विशेषकर ज्वैलर्स/रियल एस्टेट कारोबारियों को इस समय अपनी इज्जत का ख्याल जरूर रखना चाहिए

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Window display of jewelry shop
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डॉ. सचिन शर्मा

देश इस समय आर्थिक रूप से संक्रमण (परिवर्तन) काल से गुजर रहा है। रोज तमाम अखबारों और चैनलों पर दिन-रात सिर्फ रुपए ही छाए हुए हैं। एेसे में मेरे हिसाब से एक बड़े समुदाय को अपनी इमेज को लेकर बेहद सर्तक रहने की जरूरत है। आर्थिक अध्ययनों के मुताबिक देश के कुल काले धन में से 65 फीसदी कॉरपोरेट करप्शन का है। 30 फीसदी क्राइम और सिर्फ 5 फीसदी ही करप्शन है।
इसे ऐसे समझा जा सकता है- कि 65 फीसदी बड़े या छोटे व्यापारी टैक्स चोरी कर काला धन जमा करते हैं। 30 फीसदी क्राइम (इसमें आर्थिक अपराध भी शामिल हैं) दूसरे नंबर पर है। इसमें नेताओं समेत देश के कई ररूखदार लोग शामिल हैं जो बिना सोचे समझे पागलों की तरह धन जमा करने में लगे हुए हैं। उनके लिए देश के कानून को धता बताना कोई बड़ी बात नहीं है। आतंकवाद जैसे विषयों से इतर ऐसे आर्थिक अपराधों में राजनीति से जुड़े लोग बड़ी संख्या में शामिल रहते हैं। जनता की नजरों में भी उनकी इमेज इन्हीं सब अनुभवों के आधार पर घटिया है। लेकिन आज मैं यहां सिर्फ 65 फीसदी ‘कॉरपोरेट करप्शन’ की बात करूंगा।

– हम रोज सुन-पढ़ रहे हैं कि दिल्ली के सराफा व्यापारियों ने पांच दिन इनकम टैक्स विभाग के डर से अपने प्रतिष्ठान बंद रखे। पूरे देश में भी जेम्स-ज्वैलरी से जुड़े कई प्रतिष्ठानों ने अपने शटर 10 नवंबर की रात तक अच्छा मुनाफा कूटने के बाद गिरा दिए थे। सराफा कारोबार से जुड़े लोगों ने 8 नवंबर की रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोट बंदी वाले ऐलान के बाद 60 हजार रुपए तोला तक सोना बेचा (जिसकी असल कीमत 32 हजार रुपए तोला थी) और दो दिन में पूरे साल भर का माल बेच दिया। काले धन को संजोये लोग घोषणा की रात को बदहवास सी हालत में इन दुकानों में गए और बेहिसाब सोना खरीद लिया। हालांकि मेरी समझ से यह बाहर है कि सराफा व्यापारी पुराने नोट लेने के बाद उसका क्या करने वाले हैं लेकिन मुनाफा वसूली की ऐसी होली हमें अगले दो दिनों के भीतर फिर से देखने को मिली जब नमक की कमी की अफवाह तेजी से उड़ी और मंडी व्यापारियों ने 20 रुपए किलो मिलने वाला नमक 100 रुपए किलो में बेच दिया।
अमां कमाल है यार, आखिर ऐसा भी क्या लालच ? यह वही कम्युनिटी है जिसके अधिकांश सदस्यों ने जीवन में आज तक सरकार को कोई टैक्स नहीं दिया लेकिन जब देश उन्हें सुविधाएं देने से चूक जाता है तो ये सभी दिल खोल कर सरकार को कोस लेते हैं। खैर, हम वापस सराफा कारोबारियों पर लौटते हैं..

– मेरे पास ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें किन्हीं माताजी ने 30 साल पहले किसी स्थानीय सराफा व्यापारी से सोने की कोई चैन, सिक्के या सामान खरीदा, हर दिवाली को उसे पूजा, छाती से लगाकर रखा और जब किसी कारण से कभी उस सामान की असलियत पता करवाई तो..या तो वो पूरा नकली निकला या मिलावटी। माना, कि सभी ऐसे नहीं होते लेकिन इस अंधी कमाई वाले धंधे में मूर्ख बनाने का खेल बहुत पुराना है। कुछ माह पहले तो किसी ने मुझे ही 20 हजार का ‘नीलम’ कहकर ढाई सौ रुपए का रत्न ‘नीली’ पकड़ा दिया था। खैर, मैंने कोई कच्ची गोलियां नहीं खेलीं थीं सो ‘गालियां’ देकर उससे तुरंत छुटकारा पा लिया लेकिन हमारी अधिकांश जनता समझ ना होने के कारण इस समुदाय के खटपने से रूबरू होती रहती है। 8 नवंबर को यह तय भी हो गया कि काले धन को सफेद करने में हमारी बैंकों से भी ज्यादा तत्परता जेम्स-ज्वैलरी से जुड़े सराफा व्यापारियों ने दिखाई।

इसी तरह तबीयत से पूरा रंगीन हमारा एक दूसरा कारोबारी समुदाय है- रियल एस्टेट
इस समुदाय का आलम यह है कि कुछ साल पहले अमिताभ बच्चन के शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से हमें यह पता चला था कि इस जन्म में इतनी आसानी से करोड़पति भी बना जा सकता है, करोड़पति बनना हर भारतीय के लिए दूर की कौड़ी ही रहा है। लेकिन रियल एस्टेट कारोबारियों ने अमिताभ बच्चन को ‘आइना’ दिखाते हुए आज फ्लैट्स की कीमत ही करोड़ों में पहुंचा दी है। काले धन को खपाने का सबसे बड़ा जरिया बना यह व्यवसाय इतना ज्यादा ऊपर उड़ चुका है कि इस देश में फ्लैट्स 30 करोड़ रुपए तक की कीमत में पहुंच गए हैं, बड़े बंगलों की तो बात ही छोड़िए- वो सभी 100 करोड़ से ज्यादा के हो गए हैं। छोटे शहरों में ही फ्लैट्स 1 करोड़ रुपए को छू चुके हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि कॉरपोरेट करप्शन का इस देश में क्या आलम है। जबकि, एक साधारण नागरिक पूरे जीवन में दो कमरे के घर को नहीं खरीद पा रहा है और दूसरी ओर रियल एस्टेट में काला धन खपाने वाले कई सौ करोड़ रुपए की तमाम प्रापर्टी बनाए जा रहे हैं।
मुझे पूरी आशा है कि हमारी केन्द्र सरकार इन दोनों ही अंधी कमाई करने वाले व्यापारियों की जल्दी ही ‘नसबंदी’ कर देगी। इस मामले में मैं पूरे देश की जनता के साथ सरकार के साथ हूं, क्योंकि मूर्ख बनाने की मशीन बन चुके इस कॉरपोरेट करप्शन को इसी संक्रमण काल के दौरान अगर निपटा दिया जाए तो आने वाले समय में बहुत गहरी हो चुकी आर्थिक खाई को हम कुछ हद तक पाट पाएंगे।

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