‘विमुद्रीकरण’ (demonetization) पर इतना हाहाकार आखिर क्यों !!

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डॉ. सचिन शर्मा
केंद्र सरकार द्वारा 500-1000 के नोट बंद करने को लेकर फिलहाल कुछ लोगों और अधिसंख्य राजनीतिक दलों द्वारा की जा रही ‘हाहाकार’ समझ से परे है। यह एक रूटीन प्रोसेस है जिसे समय-समय पर होते रहना चाहिए, खासतौर से भारत जैसे देश में जहां देश के संसाधनों को तो सब अपने बाप की जागीर समझते हैं लेकिन देश को जब देने का समय आता है तो यही सब लोग बगल के रास्ते तलाशने लगते हैं। दानवीर कर्ण के इस देश में असल में तो दानवीर कोई भी नहीं है, सब अपना घर भरने में लगे हैं, एेसे में विमुद्रीकरण समय-समय पर होते रहना चाहिए।

सबसे पहले तो हमें समझना चाहिए कि आखिर यह ‘विमुद्रीकरण’ (demonetization) है क्या, तो परिभाषा के तौर अर्थशास्त्र की किताबों में यह इस प्रकार है..

”जब काला धन बढ़ जाता है और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन जाता है, तो इसे दूर करने के लिए विमुद्रीकरण की विधि अपनाई जाती है। इसके अंतर्गत सरकार पुरानी मुद्रा को समाप्त कर देती है और नई मुद्रा चालू कर देती है। जिनके पास काला धन होता है, वह उसके बदले में नई मुद्रा लेने का साहस नहीं जुटा पाते हैं और काला धन स्वयं ही नष्ट हो जाता है।”
तो भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बस इतना भर किया है। और सिर्फ मोदी ही क्यों, दुनिया के तमाम लोकतंत्रों और यहां तक की राजशाही में भी यह प्रक्रिया समय-समय पर अपनाई जाती रही है। जो भी शासक होता है वो भ्रष्ट लोगों के बनाए मायाजाल को नष्ट करने के लिए समय-समय पर इसे करता रहता है। भारत की लोकतांत्रिक स्थापना के बाद ऐसा दूसरी बार हुआ है और जहां तक मुझे लगता है कि इसे जल्दी-जल्दी होना चाहिए क्योंकि इस बार काला धन हमारी कुल अर्थव्यवस्था का लगभग 30-40 प्रतिशत हो गया था।

अब बात रही विलाप करने वाले नेताओं की.. तो यहां मैं बिना नाम लिए कुछ उन नेताओं के बारे में बात करना चाहूंगा जो पिछले 3-4 दिनों से मोदी को कोस रहे हैं। ये नेता खुद भ्रष्ट हैं, परिवारवादी हैं या क्षेत्रीय दलों के सुप्रीमो हैं जिन्होंने बड़ी मुश्किल से पिछले 5 साल से लेकर दो दशकों तक में कुछ सौ करोड़ रुपए से लेकर कई हजार करोड़ रुपए तक का काला धन बनाया और वो एक ही रात में मिट्टी में मिल गया। अब वे विलाप नहीं करेंगे तो क्या करेंगे ?? .. हां, विलाप करने के लिए वो आम जनता की परेशानी का रोना रो रहे हैं, 2000 रुपए के बड़े नोट से काला धन दोबारा जमा होने की बात कह रहे हैं।
तो जहां तक बात रही आम जनता की परेशानी की..तो युद्धकाल में भी आम लोगों को बहुत परेशानी होती है लेकिन वे संयम से अपने देश की आन-बान और शान के लिए कुछ समय शांति के साथ व्यतीय कर जाते हैं। यह ऐसा ही समय है, अगले कुछ दिनों में सब-कुछ सामान्य हो जाने वाला है। विलाप करने वाले नेताओं पर ध्यान देने की जरूरत इसलिए नहीं है क्यों वो एक ऐसे नेता पर निशाना साध रहे हैं जो एक कॉडर बेस्ड पार्टी से है और जिसका खुद का कोई परिवार नहीं है जिसके लिए वो काला धन जमा करे।

बात रही 2000 रुपए के बड़े नोट की, तो अभी 1000 रुपए का नया नोट भी आने वाला है लेकिन अब पहले जितना काला धन जमा होने के लिए कई वर्षों का समय लग सकता है और अगर इस बीच विमुद्रीकरण की विधि फिर से अपना ली जाती है तो बेईमान लोगों में भी काला धन जमा करने की इच्छा खत्म हो जाएगी।

अब बात काला धन जमा करके रखने वालों की..
पिछले दो-तीन दिनों में मैं कई ऐसे लोगों से रूबरू हुआ हूं जो आशावाद की प्रतिमूर्ति लग रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि कोई ना कोई रास्ता तो जरूर निकल आएगा। विकट सोना खरीद और डॉलर-यूरो को ऊंचे दामों पर खरीदने की खबरों के बीच वो लोग और भी कई रास्ते तलाशने की कोशिश जारी रखे हुए हैं। कई करोड़ रुपयों के ढेर पर बैठे ये लोग अपना पसीना छुपाते हुए कहते नजर आ जाएंगे कि हम 30-40 परसेंट में बैंक वालों से सेटिंग कर लेंगे (विजय माल्या की जय हो)। बैक डेट में जमीन-जायदाद खरीद लेंगे, अपने नौकरों और कई अन्य गरीब लोगों के बैंक अकाउंट इस्तेमाल कर लेंगे (अखबार में छप रही खबरों और चेतावनियों के बावजूद)। ऐसे सिर खपाऊ लोगों की एक लंबी फौज गूगल पर काले धन को सफेद करने के तरीके ढूंढ रही है और इसमें गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और यूपी के लोग अव्वल नंबर पर हैं। विडंबना है कि इसमें से यूपी को छोड़ सब जगह भाजपा की ही सरकारें हैं और मोदी ने किसी को भी नहीं बक्शा।

खैर, इन परेशान और खस्ताहाल लोगों की हालत देखकर हमें लग रहा है कि चोट्टों, अब सुधरा जाओ..बेईमानी की गलियां तलाशने के बजाए देश को चुपचाप टैक्स दो, अपना घर भरना छोड़ो, अपनी सात पुश्तों के लिए जमा करने वाले मानसिक रोग से मुक्ति पाओ और देश की अर्थव्यवस्था को कुछ वैसा बनाने में सहयोग दो जैसा ज्यादातर संपन्न देशों की है, जहां काला धन जमा करना शान की बात नहीं बल्कि भयंकर अपराध है, और जहां सभी लोग देश को सुदृढ़ बनाने के लिए टैक्स देते हैं, उसे बचाने के लिए गूगलिंग नहीं करते।

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