सिंधिया की सक्रियता के खिलाफ गोलबंदी

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राकेश अचल

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की डांवाडोल नैया को सम्हालने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की सक्रियता से कांग्रेस में उठापटक शुरू हो गयी है.और इसका श्रीगणेश किया है पूर्वमुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खेमे ने .कांग्रेस के पूर्व मंत्री डॉ गोविन्द सिंह ने सिंधिया के खिलाफ न केवल तंज कसा बल्कि आरोप है की अम्बाह में उन्हें काले झंडे भी दिखवाए. मध्यप्रदेश कांग्रेस में इस समय तीन ही बड़े छत्रप हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा दिग्विजय सिंह और कमलनाथ का प्रभुत्व ही मध्यप्रदेश में कांग्रेस की नाव डूबता या उबारता रहा है .पूर्व मंत्री सुरेश पचौरी की सेहत ठीक न होने से वे अब अधिक सक्रिय नहीं हैं और बाकी सब एक-दुसरे के पीछे खड़े होकर अपना वजूद बनाये हुए हैं .कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की बढ़ती उम्र अब उनके आड़े आ रही है हलनिक उन्होंने अपने गढ़ को धंसकने से बचने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी है.उनकी चिंता में कांग्रेस कम अपना पुत्र ज्यादा है . बीते पंद्रह साल से जैसे-तैसे छिंदबाड़ा का अपना गढ़ सम्हाले हुए कमलनाथ की समस्या भी कांग्रेस कम बेटा ज्यादा है ,अकेले ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं जिनके पास अभी काम करने की उम्र भी है और फिलहाल अपने बेटे को स्थापित करने की कोई चुनौती नहीं है,क्योंकि वो अभी छोटा है .ऐसे में सम्भावना इस बात की है की पार्टी हाईकमान इस बार सिंधिया को केंद्र में रखकर दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी करे ?ऐसे में बाकी के नेताओं के हासिये पर जाने की आशंका प्रबल हो सकती है. सूत्रों का कहना है की इस समय प्रदेश में हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया का अपना कोई गढ़ नहीं है किन्तु उनकी लोकप्रियता मध्यप्रदेश के सभी हिस्सों में समान रूप से एक जैसी है .वे ग्वालियर-चम्बल के अलावा बुंदेलखंड,मालवा और महाकौशल में भी मतदाताओं को आकर्षित करने में समर्थ दिखाई देते हैं .सिंधिया के पास भी एक राजनितिक विरासत है .और दिग्विजय सिंह के पास भी कमलनाथ की अपनी विरासत है .पूर्वमुख्यमंत्री स्वर्गीय अर्जुन सिंह के समर्थक अब दिग्विजय सिंह के पीछे खड़े होने को विवश हैं क्योंकि अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह कोई कमाल नहीं कर सके . आपको याद होगा की पिछले विधान सभा चुनाव में कांग्रे जीतते हुए भी हार गयी थी,क्योंकि पच्चीस फीसदी से ज्यादा सीटें उसने बहुत कम अंतर से गँवा दी थीं.ये नुक्सान संगठन की कमी से और प्रशासनिक मशीनरी का दुरूपयोग न रोक पाने के कारण हुआ था .सिंधिया ने इस कमजोर कड़ी को रेखांकित कर हाईकमान को अवगत करा दिया है,समझा जा रहा है की इस बार हाईकमान सिंधिया को फ्रीहैंड देकर दोबारा सत्ता में वापसी का प्रयास कर सकता है . सूत्रों के मुताबिक सिंधिया का रास्ता रोकने के लिए भाजपा के साथ ही कांग्रेस में भी उठापटक शुरू हो गयी है. भाजपा ने जहाँ हाल ही में अपनी प्रदेश कार्यसमिति में सिंधिया को ध्यान में रखते हुए उन्हें घेरने की रणनीति बनाई वहीं कांग्रेस के सिंधिया विरोधी छत्रपों ने भी अपने घोड़े छोड़ दिए .सिंधिया के प्रबल विरोधी रहे विधायक डॉ गोविन्द सिंह ने सिंधिया के खिलाफ मुंह खोला तो सिंधिया समर्थक भी डॉ गोविन्द सिंह को पार्टी से निकलने की मांग कर उठे .कलह की ये शुरुवात चम्बल से हुयी है. चम्बल में दिग्विजय सिंह के मार्शल के रूप में डॉ गोविन्द सिंह और केपी सिंह का नाम प्रमुख है लेकिन केपी सिंधिया को कभी अपने इलाके में हारने नहीं देते. पार्टी सूत्रों का कहना है की सिंधिया के पास आम मतदाता को आकर्षित करने का चुम्बक तो है किन्तु संगठन में सबको साथ लेकर चलने का कौशल कुछ कम है ,उनका शाही स्व्भाव कभी-कभी उनके लोकतान्त्रिक स्वभाव पर हावी होने लगता है,वे यदि इस पर काबू पा लें तो मुमकिन है की उन्हें अपने मिशन में कामयाबी मिल जाए .भाजपा शासित राजस्थान में सिंधिया जैसे ही ऊर्जावान सचिन पायलट ने कांग्रेस को अपने पैरों पर खड़ा करने की चुनौती पहले ही अपने कन्धों पर ले ली है अब अगर सिंधिया भी मध्यप्रदेश में प्राणपण से जुट जाएँ तो मुमकिन है की भाजपा को लगातार चौथी बार सत्ता में बने रहना कठिन हो जाए. आपको याद होगा की ज्योतिरादित्य सिंधिया पंद्रह साल पहले अपने पिता माधवराव सिंधिया के एक विमान हादसे में दिवंगत होने के बाद राजनीति में आये थे .उप चुनव के बाद लोकसभा में पहुंचे सिंधिया ने फिर कभी पीछे मुद कर नहीं देखा .संसद में उनकी उपस्थित हमेशा प्रभावी और चर्चित रही .जम्मो-कश्मीर के मुद्दे पर उनके भाषण से बखेड़ा हो गया था लेकिन उन्होंने तत्काल अपनी गलती सुधर ली थी. उन्होंने जम्मो-कश्मीर में जनमत संग्रह की बात कह दी थी .भाजपा ने इसी बात को पकड़ कर उनके डीएनए पर सवाल खड़े कर दिए थे लेकिन उन्होंने भाजपा पर पलटवार कर सबका मुंह बंद करा दिया था. सिंधिया नेकहा था की -मेरा डीएनए वो ही है जो मेरी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया का या बुआ यशोधरा राजे और बसुंधरा राजे सिंधिया का है.ये सब भाजपा में हैं.

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