सर्जिकल स्ट्राइक का प्रचार: राष्ट्रवाद नहीं , नासमझी है

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राकेश अचल
भारतीय सेना ने लक्ष्यभेदी प्रहार कर आतंक के प्रशिक्षण स्थल नेस्तनाबूद किये इसके लिए भारतीय सेना प्रणम्य है किन्तु जिस तरह से इस कार्रावाई को सुनियोजित ढंग से प्रचारित किया गया है उसके पीछे सरकार के नहीं तो सरकारी पार्टी के निहितार्थ साफ़ झलकते हैं,और ऐसा कहने में मुझे न कोई संकोच है और न भय .
भारतीय सेना ने आतंकी हमलों के मद्दे नजर पहले भी पड़ौस में जाकर इसी तरह के एक नहीं दर्जनों लक्ष्यभेदी प्रहार किये हैं ,किन्तु अतीत में ऐसा कोई प्रसंग नजीर नहीं है जब उसे जानबूझकर सिर्फ इसलिए प्रचारित किया गया हो ताकि किसी सियासी महल की दरकती ईंटों को गिरने से बचाया जा सके. हम शुरू से प्रतिकार के हामी रहे हैं और हमने शुरू से युद्ध का विरोध किया है .पाकिस्तानी हुक्मरानों की तो मजबूरी है की वे अपनी कुर्सी बचाये रखने के लिए सेना के पुरुषार्थ का सहारा लें किन्तु भारत में अब तक ऐसी परिस्थिति न बनी है और न बनाई जाना चाहिए. सेना देश की सरहदों की रक्षा के लिए है और उसके पुरुषार्थ वहीं तक निहित रहना चाहिए. सेना के पुरुषार्थ को किसी के सीने के माप से जोड़ना एक आपराधिक कृत्य है .
ये हकीकत है की उड़ी हेल के बाद देश का अवाम मौजूदा सरकार के रवैये से बेहद गुस्से में था और इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ता लेकिन सरकार ने सामयिक कार्रावाई कर अपनी राजनितिक इच्छाशक्ति का मुजाहिरा कर दिया था ,किन्तु उसके बाद देश भर में सरकारी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जिस तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दी है वो पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रीय कम सियासी ज्यादा बनाने वाली हैं.
देश सार्वभौमिकता,संप्रभुता और अखण्डता के मुद्दे पर बीते सत्तर साल से एक है और आगे अनंतकाल तक एक रहेगा,सत्ता में कौन है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता .देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करना हमारी परंपरा है ,अपने नेताओं की राजनितिक इच्छाशक्ति का भी देश ने सदैव सम्मान किया है,चाहे फिर वे इंदिरा गाँधी हों या अटल बिहारी वाजपेयी या आज नरेंद्र मोदी .लेकिन ये व्यक्तिगत और राजनितिक सफलताएं नहीं देश की सफलताएं हैं और इन्हें इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए .यदि इस उपलब्धि का इस्तेमाल सियासी फायदे के लिए कीयिए जाएगा[जैसा की किया जा रहा है]तो सेना का सारा शर्म अकारथ हो जाएगा. मै फिर जोर देकर कहता हूँ की सेना देश के लिए है ,सियासत के लिए नहीं .
ये समय बेहद संयम और सतर्कता का है,उम्मीद की जाना चाहिए की सरकारी पार्टी अपनी नीयत को साफ़ रखे और आने वाले दिनों की चुनौतियों के लिए खुद को और देश को तैयार रखे.सियासत बाद में भी की जा सकती है.ये समय देश सेवा का है और यही की भी जाना चाहिए .हम अतीत में देखें ,झांकें तो पाएंगे की ये गलती न इंदिरा गांधी ने की थी और न अटल बिहारी वाजपेयी ने .दोनों ने अपनी सरकार की कामयाबी को सहजता से अंगीकार किया था.प्रपंच से दोनों दूर रहे थे.किसी ने अपना सीना खोल कर नहीं दिखाया था .अब भी ऐसा ही किया जा सकता है, किया जाना चाहिए.क्योंकि लोकतंत्र की यही यही जरूरत है .

1 टिप्पणी

  1. माननीय, मै प्रारंभ से हि यह महसुस कर रहा हुं कि जिस तरह से सर्जीकल स्टाईक को सीमा मे घुसकर हमला व ५६”सीना के तारिफ से जोडकर प्रचार किया जा रहा है आपका लेख वही कह रहा है ।

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